5th Feb, 2026
हमारे यहां जीवनियां या आत्मकथाएं क्यों नहीं लिखी जातीं, इस पर विचार करते हुए ‘हंस’ के किसी अंक में मैंने कुछ नतीजे निकालने की कोशिश की थी: पुरानों के बारे में प्रमाण और साक्ष्य नहीं मिलते और समकालीन लोग भारतीय ‘हिप्पोक्रेसी’ (ढोंग) के शिकार हैं. जीवन की क्षुद्रता, क्षणभंगुरताµव्यक्तिगत अहं का निषेध और ‘मैं किस लायक हूं. मेरा जीवन सचमुच इतना महत्वपूर्ण नहीं’ का ‘सांस्कृतिक’ शील या ‘कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना, सिर धुनि गिरा लागि पछताना’ के चिंतन स्वरूप ‘‘तुलसी अब का होंइंगे, नर के मंसबदार’’ की घोषणाएं. सृष्टा का ब्रह्म की तरह अपने आपको रचना के पीछे छिपा देना; उसका हर कहीं और कहीं न होने का दार्शनिक तत्ववाद यानी रचनाकार को अदृश्य करके रचना को सामने रखने की औपनिषदिकता इत्यादि... मगर जीवनियां या आत्मकथाएं न होने के ये सारे तर्क मुझे इसलिए सही नहीं लगते कि राजाओं ने यानी एक प्रभु-वर्ग ने कार्यों और विचारों के विवरण देते हुए अपने नामों के शिलालेख भी छोड़े हैं और जीवनियों या रासो-शृंखला के रूप में उनकी प्रशस्तियां भी कम नहीं हैं. ये तर्क उन पर लागू क्यों नहीं होते थे? नतीजा यह क्यों न निकाला जाए कि राजा ही इतना महत्वपूर्ण होता था कि दरबारी रचनाकारों का सारा श्रेय या तो खुद ले लेता था या जो दरबारी नहीं थे उन्हें गुमनामियत चुन लेने को मजबूर होना पड़ता था. वे राजा की बजाय उसे भगवान के नाम समर्पित कर देना बेहतर समझते थे. इसलिए जीवन-वृत्त और साक्ष्य राजाओं-सम्राटों के तो मिलते हैं, रचनाकारों के नहीं. या जो हैं भी वे इतने आधे-अधूरे, अप्रामाणिक और किवंदतियों से भरे हैं कि वास्तविकता का पता ही नहीं चलता, जैसे ‘‘बावन वैष्णव की वार्ता’’ ‘अर्धकथानक’ एकमात्रा आत्मकथा है जो सत्ता से अलग चार सौ साल पहले लिखी गई थी-हिंदू नहीं जैन, परंपरा में.
मगर इस सबसे अलग या कहें इस सबके ही परिणामस्वरूप एक और कारण भी सबसे महत्वपूर्ण हो सकता है, इस बात का ज्ञान मुझे ‘साहित्य अकादमी’ के ‘अपने झरोखे से’ कार्यक्रम में हुआ. मुझे मोहन राकेश पर बोलना था और इसे मैं तीन-चार सालों से स्थगित कर रहा था. जाहिर है मेरी बात संस्मरणों के नाम पर परोसे जाने वाली परिपाटीबद्ध प्रशस्तियों और विरुदावलियों से अलग थी. संस्मरण हो या श्रद्धांजलि, हमारी भाषा इतनी रूढ़, बासी, अतिशयोक्तियों से लदी और प्रशस्तिपरक होती है कि उनके पीछे का आदमी गायब ही हो जाता है. भेद कर पाना मुश्किल है कि जिसके बारे में कहा जा रहा है, वह जीवित भी हैं या चल बसे...मैं व्यक्ति राकेश का समग्रता में मूल्यांकन करना चाहता था- न मुझे अपनी बात को ‘स्कैंडलस’ बनाना था, न देव-महात्म्य...जाहिर है दृष्टिकोण मेरा था. उसके पीछे लंबी समकालीनता, दोस्ती की अंतरंग निर्भरताएं भावनात्मक हिस्सेदारियां हैं तो आपसी स्पर्धाएं, ईष्र्याएं, कुंठाएं तथा व्यक्ति और स्थिति को देखने के कोण और व्याख्याएं भी मेरी ही हैं. अगर ऐसा न हो तो किसी भी बड़े-छोटे व्यक्ति की केवल एक ही जीवनी लिखी जाए. ‘‘बुरा जो देखन मैं चला, मुझ-सा बुरा न कोय’’ के हिसाब से तो दुनिया में कुछ भी लिखना व्यर्थ है. आखिर कुछ तो ‘अलगपना’ रहा होगा कि तोलस्तोय पर बीसियों जीवनियां लिखी गईं और गांधी आज भी जीवनी लिखने वालों के लिए चुनौती हैं. सभी जगह व्यक्तिगत कुंठाएं और दूसरे की महान सफलताओं से दग्धताएं ही तो नहीं हैं. किसी के जीवित रहते हम उसके जीवन की सच्चाइयां इसलिए नहीं लिखते कि पता नहीं, अगले को क्या बुरा या गलत लग जाए. (बच्चन की जीवनी प्रकाशवती प्रसंग) और मरने पर इसलिए चुप रहते हैं कि ‘मरना ही महान होना है’ या ‘काल सबसे बड़ा क्षमाकर्ता है’ की कुंठा से मुक्त नहीं हो पाते. अब वे बेचारे जैसे थे वैसे थे, नहीं रहे तो क्यों उनकी छीछालेदर की जाए...या ऐसा ही था तो उनके रहते कहकर दिखाते. यानी अगर आप मरने वाले की आरती नहीं उतारते तो निश्चय ही छीछालेदर करते हैं, ‘‘खुदा बख्शे, बहुत-सी खूबियां थीं मरने वाले में...’’ की ही हिप्पोक्रेसी है कि हमारे पास निराला, प्रेमचंद, मुक्तिबोध, अज्ञेय और राहुल जैसे गतिशील, विस्फोटक व्यक्तियों के न विश्लेषण हैं, न व्याख्याएं. रचना और व्यक्तित्व की द्वंद्वात्मकता को समझने वाली तो कोई अंतर्दृष्टि है ही नहीं. (मुक्तिबोध पर मणि कौल की ‘सतह से उठता आदमी’ फिल्म अपवाद है.) रामकमल राय की अज्ञेय पर लिखी जीवनी पढ़कर लगता ही नहीं कि हम एक विद्रोही या परिपाटी-भंजक व्यक्ति के बारे में पढ़ रहे हैं. हमारे यहां मरने पर हर व्यक्तित्व का सिर्फ हनुमान- चालीसा ही लिखा जा सकता है. जिसके बारे में भी उसके श्रद्धालुओं या भक्तों ने जो छवि बना ली है उससे अलग कुछ भी कहना उस ‘महान आत्मा’ के प्रति विश्वासघात है. उसे लगभग एक शहीद का दर्जा देना हमारे चरित्रा की मजबूरी हैµक्योंकि कल हमें भी तो मरना है. ऐसे मनोवैज्ञानिक दबावों में जीवन की कुछ मोटी-मोटी घटनाओं के विवरणों या सब कुछ महान, सब कुछ अद्वितीय की ‘ओम जय जगदीश हरे’ छाप आरतियों के सिवा लिखा या कहा भी क्या जा सकता है? परिणाम यही हुआ कि इन मूर्तिपूजकों के चंगुल में या तो भारतेन्दु, निराला, उग्र, भुवनेश्वर जैसे चुनौती-भरे ‘व्यक्तित्व’ महानता की गुमनामियों में डाल दिए गए या उन पर इतना घी-सिंदूर पोता गया कि कृष्ण, विष्णु या राम की मूर्तियों की अलग पहचान ही खो गईµसब एक से सपाट, एक से श्रद्धेय.
खतरनाक बात यह है कि मोहन राकेश भी आज उन्हीं मूर्तिपूजकों की जायदाद हैं जो समग्रता में न उसके व्यक्तित्व को समझना चाहते हंै, न ‘व्यक्ति’ को देखना. उनकी दिलचस्पी सिर्फ उसकी मृत्युगत महानता को ही जिंदा रखने में हैं. वे राकेश की व्यक्तित्वगत जटिलताओं को ‘निश्छल’, ‘उदार’, ‘महान’, ‘प्रतिभाशाली’ की शब्दावली में ही डिसमिस कर देना चाहते हैं. उनके हिसाब से न उसमें कहीं कोई अंतर्विरोध थे, न उसके बनने में पृष्ठभूमि और परिवेश का कोई हाथ था. वह सीधा, सपाट, वन डायमेंशनल (एकायामी) सतही आदमी था. अगर सचमुच वह ऐसा ही था तो और कुछ भी हो सकता था, लेखक नहीं हो सकता थाµक्योंकि ईमानदार लेखन मूलतः अपने भीतर की खाई-खंदकों, शिखरों और ढलानों की यात्राओं, तकलीफों, तनावों या सुखों की अभिव्यक्ति के सिवा कुछ हो ही नहीं सकता और इस ग्रीनरूम में झांके बिना उसका कोई भी मूल्यांकन झूठा, बनावटी और फूहड़ यानी एकेडेमिक है.
शुरू में ही यह स्वीकार करते हुए कि यह मेरा निजी कोण है और हरेक इससे असहमत हो सकता है, मैंने मोहन राकेश के जीवन और व्यक्तित्व के अंतर्विरोधों को रेखांकित करने की कोशिश की थी. मैंने न उसके ‘लेखन’ के महत्व से इनकार किया, न नाटक में उसके युग प्रवर्तक अवदान को नकारा. उस अकेले व्यक्ति ने हिंदी नाटक का मुहावरा बदला है, इसे कैसे अनदेखा किया जा सकता है? एक समय के अत्यंत महत्वपूर्ण अभिनेता और मणि कौल जैसे फिल्मकार उसके नाटकों से बने हैं, इससे भी कौन इनकार करेगा. नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामा की तो तीन पीढ़ियां राकेश के नाटकों में जीकर बड़ी हुई हैं. इस मामले में उसका प्रभाव अपने शेष दोनों साथी नाटककारोंµबादल सरकार और गिरीश कर्नाड से ज्यादा गहरा है क्योंकि रंगमंच की ‘देशव्यापी’ हलचलों का केंद्र पिछले दसियों सालों से दिल्ली रहा है; मान्यता देने के सत्ता-संस्थान दिल्ली में ही हैं इसलिए दिल्ली द्वारा मान्य घटना या व्यक्ति ‘अखिल भारतीय’ हो जाते हैं. कम से कम अनदेखे नहीं रहते और यह सुविधा राकेश को भी मिली. यह सही है कि जब हम व्यक्तित्व की बात करते हैं तो सफलताओं और उपलब्धियों के इन पक्षों को भी ध्यान में रखना चाहिए. मैंने अपने वक्तव्य में अपेक्षित रूप से ऐसा नहीं किया, निश्चय ही यह मेरी गलती थी. मैं यह मानकर चला था कि राकेश के साहित्यिक और रंगमंचीय महत्व को दोहराने की जरूरत नहीं है- अगर वह नहीं होता तो हम साहित्य अकादेमी के सभागार में इतनी बड़ी संख्या में जुटते ही क्यों? मैं यह भूल गया था कि वहां अधिकांश लोग वे हैं जो सिर्फ ‘महान नाटककार’ से परिचित थे और उन्होंने व्यक्ति को नहीं, श्रद्धेय व्यक्तित्व को जाना था. परिणामतः अपने ‘नायक’ के बनने की इस प्रक्रिया के दर्शन से उनकी भावनाओं को धक्का लग सकता था. हालांकि, मैंने अपने वक्तव्य में कई बार कहा था कि- राकेश की जिंदगी में परिचितों और मित्रों के साफ-साफ दो अलग वर्ग हैं- एक, जो उसके बनने के दौरान निकट रहे, दूसरे वे जो उसकी सफलताओं के साथ आए. दूसरे वर्ग में अधिकांश नाटक या फिल्म के लोग. उस समय वह सत्ता का हिस्सा थाµपुरस्कार, नेहरू फेलोशिप, सेंसर बोर्ड की गवर्नरी और न जाने कहां-कहां की मेंबरशिप, देशी-विदेशी यात्राएं, रंगमंचीय जय-जयकार...इस अवधि में उसने प्रायः कुछ नहीं लिखा. उसका रचनाकाल और डायनेमिज्म पीछे छुट चुके थे. जो दोनों ही अवधियों में साथ रहे वे या तो राजबेदी, गिरिधारी जैसे गैर- साहित्यकार थे, जो दोस्त की उपलब्धियों से गौरवान्वित होते थे या अनिता और कमलेश्वर जैसे उपकृत-समर्पित. बाकी सबसे संबंध प्रोफेशनल थे जिन्हें व्यक्तिगत बना देने की व्यवहार-कुशलता को उसने बीस साल में अचूक परफेक्शन दिया था. इनमें से किसी का भी लिखा राकेश के अंतर्विरोधों, उनसे जूझने या उन्हें रिजाॅल्व करने के तनावों की कोई गवाही नहीं देता. वह स्वर्ग-भ्रष्ट देवता के प्रति भक्ति-निवेदित उच्छवास हैं जिन्हें राकेश ने ‘‘तू ही मेरा अकेला और एकमात्रा दोस्त है’’ के पुराने फाॅर्मूले से अर्जित किया था. एक अच्छी शाम झटक लेने के लिए आज भी धीरेंद्र अस्थाना यही करता है.
राकेश के जीवन को समग्रता में देखने पर सबसे बड़ा अंतर्विरोध तो यही दिखाई देता है कि जो व्यक्ति इतनी भागदौड़ और हंगामे भरी जिंदगी जीता रहा, आज दिल्ली तो कल बंबई, परसों कुल्लू तो अगले दिन जमशेदपुर भागा फिर रहा है. जो एक के बाद एक नौकरियां, दोस्तियां, पत्नियां और स्थान छोड़ रहा है वह लेखन और जीवन में इतना व्यवस्थित कैसे है? उसकी किसी भी रचना में न कहीं कोई झोल है, न ढीलापन. वे कई-कई बार लिखी चुस्त और तराशी हुई रचनाएं हैं- कलात्मक चुनौतियों का सामना करती हुई. उनमें वह ‘कच्चापन’ भी प्रायः नहीं है जो उम्र के साथ-साथ पकता है. वे बेहद संतुलित, संवेदनशील, वयस्क मस्तिष्क की उपज हैं. इस बाहरी भागम-भाग, तोड़ने-छोड़ने की सन्नि- पातिकता और इस आंतरिक व्यवस्था, संतुलन के बीच कोई अंतक्र्रिया है या वे दो अलग और अछूते समानांतर धरातल हैं जो आपस में एक-दूसरे को न काटते हैं, न प्रभावित करते हैं! वे एक-दूसरे से पलायन हैं या प्रेरणा? यह लगभग साफ है कि परिस्थितियों ने जिधर धकेला, या भीतरी-बाहरी दबावों में जो संभव हुआ, उधर बह निकलने वाली या केवल झटकों या झखों में निर्णय ले डालने वाली जिंदगी उसकी नहीं है. उसकी भटकनें निश्चय ही यायावरी उद्देश्यहीनता की घुमक्कड़ियां नहीं हैं- उनके पीछे बाकायदा एक व्यवस्थित दृष्टि और संतुलित अंतर्सूत्राता है. राकेश की सारी बनावट राहुल सांकृत्यायन के नहीं, अज्ञेय के ज्यादा निकट पड़ती है. राहुल की यात्राएं सहज, जंगली नदी की तरह हैं, जिधर रास्ता निकला उधर बह चले; अज्ञेय और राकेश साफ-सुथरी नहरों की तरह विशेष नदियों या मुख्य धाराओं की तरफ बढ़ते हैं. राकेश को मालूम है कि उसकी आखिरी चट्टान कहां है! मुझे लगता है कि अव्यवस्था और भटकन न अज्ञेय की प्रकृति है, न राकेश की- वे उनकी योजनाओं के हिस्से हैं. जब वे भटकते और बहकते हैं तब भी अच्छी तरह जानते हैं कि वे वेश बदले हुए राजाओं की तरह मुसीबतें और कष्ट उठा रहे हैं- उनके ‘राज्य’ अपनी जगह सुरक्षित हैं. जेल, फरारी, यायावरी और देश-काल को एक सिरे से दूसरे सिरे तक नापने के बावजूद अज्ञेय जी ने अपने लेखन के एक-एक पर्चे को संभालकर रखा है. पिछले दिनों ‘गांधी शांति प्रतिष्ठान’ में उनकी जिल्दबंद पांडुलिपियां देखकर ही लगता था कि सारी अव्यवस्था के पीछे कितना कठोर अनुशासन है.
बाहरी अतार्किकताओं के पीछे का तर्क (मैथड इन मैडनेस) ही वह सूत्रा है, जिसके माध्यम से मैं राकेश को समझना चाहता हूं. शुरू में उसने भले ही गाइडनुमा कुछ लिखा हो, लेकिन बहुत जल्दी ही तय हो गया कि उसे बड़ा, महत्वपूर्ण और सफल लेखक होना है. और यह मैं व्यक्तिगत अनुभव और लंबी घनिष्ठता के आधार पर दावे से कह सकता हूं कि राकेश की एकमात्रा प्रतिबद्धता लेखन ही रही हैµवहां उसने न समझौते किए और न वह सब लिखा जो नहीं चाहा. हो सकता है इस दिशा में कालिदास उसका आदर्श बन बैठा हो (वह संस्कृत का गोल्ड मेडलिस्ट था) क्योंकि यही वह व्यक्ति है जिस पर उसने शुरू से ही अलग-अलग समय, अनेक तरह लिखा है, कभी कहानी की तरह, कभी रेडियो-रूपक की तरह, कभी नाटक की तरह परिणति है ‘आषाढ़ का एक दिन’.
‘आषाढ़ का एक दिन’ मूलतः सत्ता और रचनात्मकता के संघर्ष की कहानी है, जो रचनात्मकता एक साधारण आदमी को कालिदास बनाती है, उसे ही सीढ़ी बनाकर वह ऊपर की अभिजात दुनिया में जा शामिल होता है, जिंदगीभर इस दंश से क्षत-विक्षत रहता है कि उसने अपने ‘आप’ के साथ विश्वासघात किया है. ‘आषाढ़’ राकेश की सबसे प्रामाणिक आत्मकथा भी है. अपनी अन्वेषी दृष्टि और मिथ को तराशकर उसने ऐसे कालिदास को खोज निकाला था जो थोड़े हेर-फेर के साथ अनेक धरातलों पर ईमानदारी से लेखक को अभिव्यक्त करता है- ठीक उसी तरह जैसे आचार्य हजारी प्रसाद जी ने ‘वाण’ को खोजा था. प्राध्यापक और विद्वान आज भी माथापच्ची कर रहे हैं कि ये कालिदास और वाण प्रामाणिक हैं या नहीं. अज्ञेय और राकेश में एक समानता यह भी है कि दोनों ने रचनाओं के बहाने आत्मकथाएं या आत्मसंघर्ष लिखे हैं, इसलिए उन्हें स्वायत्त या लेखक-निरपेक्ष रचनाओं के रूप में समझना अधूरे नतीजों में भटका सकता है. जैनेन्द्र और यशपाल में ऐसा नहीं है. वहां बहुत कम है जो जीवनी-निर्भर हो- हां, जीवन या समाज के मुद्दे और सरोकार जरूर उनके लेखन के केंद्र में हैं. सत्ता, हिंसा, सेक्स या पैसा जैनेन्द्र के ऐसे मूल्य हैं जिन्हें वे बार-बार अपने भीतर उतरकर जांचते हैं. शोषण, सेक्स, धर्म और समाज की डायनेमिक्स यशपाल के सरोकार हैं. इन सवालों को अज्ञेय के शेखर या भुवन बहस के धरातल पर उठाते जरूर हैं, मगर मूलतः उनका स्रोत और लक्ष्य अपना जीवन ही है. वे अपने आपसे बाहर या दूर नहीं जाते. राकेश की मानसिकता (केमिस्ट्री) यहां अद्भुत रूप से अज्ञेय से मिलती है. दोनों में ही निजी को सामाजिक बनाने का आग्रह हैµअज्ञेय में कम, राकेश में ज्यादा. वह निजी क्या है जिसे सामाजिक बनाया जा रहा है- बिना इस प्रक्रिया को समझे अज्ञेय या राकेश को कैसे समझा जा सकता है? अपने जीवन काल में दोनों का ही व्यक्तित्व इतना सम्मोहक, आतंकास्पद और छा जाने वाला रहा है कि रचना दूसरे स्थान पर उतर आती है. ठीक आज के चित्राकार हुसैन की तरह हुसैन- माधुरी दीक्षित के चित्रा बना रहे हैं, हुसैन ने इन्दिरा जी को लेकर दुर्गा-शृंखला बनाई है, हुसैन आशु-चित्रा बनाएंगे.
कला और साहित्य की दुनिया में इन स्टारनुमा बड़े व्यक्तित्वों की ट्रेजेडी यही होती है कि वे खुद अपनी रचना के प्रतिद्वंद्वी बन बैठते हैं- वे रचना को पीछे धकेल कर कैमरे के सामने खड़े हो जाते हैं. उनकी रचनाओं की ‘श्रेष्ठता’ उनके व्यक्तित्व की महानताओं को जोड़कर ही आंकी जा सकती है. अनिवार्यतः आंकी जाती है. फिल्म सत्यजित रे ने बनाई है इसलिए उसे तो ‘महान’ होना ही है. अब इस महानता और स्टारत्व की अपनी शर्तें हैं. सत्ता और व्यवस्था की सम्मिलित स्वीकृति के बिना न कलाकार स्टार हो सकता है न इस धरातल पर महान. सबसे पहली बलि यहां उसे देनी पड़ती है अपने उस ‘विद्रोह’ की जो इस महानता की सीढ़ी रहा है. यहां उसकी जिंदगी के तर्क कला या समाज की विषमताओं से नहीं, अपने सत्ता में होने के जायजीकरण (जस्टीफिकेशन) उसे उपजाते हैं, उसकी रचना जिरह नहीं, वक्तव्य होती है. नतीजे में भौतिक रूप से इन ‘महान व्यक्तित्वों’ के हटते ही जो शून्य पैदा होता है उसका खामियाजा रचना को भी भुगतना पड़ता है. जो अब तक व्यक्तित्व-संदर्भ से ही संरक्षण और मूल्यांकन पा रही थी, वह अब निरीह और निष्कवच सामने है- बड़े बाप के मरने के बाद, बाप के बड़प्पन में बौने रह गए बेटे की तरह, किंवदंतियों या स्मृतियों में बाप यहां लगभग बेटे का शत्राु बनकर उभरता है. बेटा या तो बाप के जीवनकाल में ही विद्रोही और गुस्ताख बनने लगता है, महात्मा गांधी के हीरालाल की तरह या मरने पर बाप के नाम से ही चिढ़ता है, प्रेमचंद के अमृतराय की तरह. वह अपना स्वतंत्रा और स्वायत्त मूल्यांकन चाहता है जो प्रायः उसे नहीं मिलता. अक्सर व्यक्तित्वहीनता ही बड़े बाप के बेटे की नियति या विरासत है. स्टार और रचनाकार के बीच इस ‘शत्राुता’ को समझने के लिए संबंधों की इस द्वंद्वात्मकता को समझना जरूरी है. अज्ञेय और राकेश दोनों ही इस दुर्घटना के शिकार हुए हैं. दोनों की ही रचनाएं इस शून्य की गिरफ्त में आई हैं- या कहें अस्थाई उदासीनता से गुजर रही हैं- यानी साहित्य में नहीं, विश्वविद्यालयी शोधार्थियों के बीच ‘ऐतिहासिक महत्व’ की कसौटियों को भुगत रही हैं. ठीक इनके विपरीत हैं मुक्तिबोध- जो जीवन में न महान हुए, न स्टार- मगर निरंतर प्रासंगिक होकर साहित्य में उपस्थित रहे, आज भी हैं.
मगर स्टार या महान होना, रचनाकार को कहां और किन स्तरों पर तोड़ता या प्रभावित करता है, इसकी गवाही अज्ञेय से ज्यादा मोहन राकेश में है. दोनों ही अपने आपको लेकर इतने अधिक आश्वस्त और निश्चिंत हैं कि महान बनना उन्हें अपना सहज और प्राकृतिक प्राप्य लगता है. अज्ञेय व्यवस्था से ऊपर उठकर सत्ता से दूरी और निकटता दोनों बनाए रखते हैं, अस्वीकृतियों का या अधिक सही कहा जाए तो बारगेनिंग का अधिकार उन्होंने अंत तक अपने पास ही रखा. राकेश ऐसा नहीं कर पाया- वह व्यवस्था को चुनौती देने की प्रक्रिया को सत्ता के साथ सौदे करने के लिए इस्तेमाल करता रहा और अंत में लगभग उसे समर्पित हो गया. सही है कि वह कमलेश्वर की तरह दयनीय और उपहासास्पद नहीं हुआ, न उसने इंदिरा जी के साठ लाख दरवाजों के सामने जुहारें की, न अंतुले से लेकर साठे के दरबारों में सजदे किए, खुद अपनी महानता की शेखियों में भी राकेश नहीं पड़ा. हां, प्रतिरोध की भाषा जरूर कहीं पीछे छूट गई. माया-महल का हिस्सा बनने के अप्रतिरोध्य सम्मोहन और इस समर्पण की यातनादायी परिणतियों की पहचान, अज्ञेय से अलग उसके व्यक्तित्व को नया आयाम देती है. यह तकलीफ कहीं-कहीं श्रीकान्त वर्मा की कविताओं में भी है.
और यही इस बात की भी कुंजी है कि क्यों उसके तीनों नाटकों के नायक अंतिम अंकों में टूटे, बिखरे, हारे हुए व्यक्ति हैं जो लंबे-लंबे एकालापों में प्रायश्चित या आत्मधिक्कार कर रहे हैं. सत्ता, समृद्धि, यश और शक्ति की दुनिया से लौटकर वे अपना वही पुराना पा लेना चाहते हैं जिसे छोड़कर ग्लैमर की दुनिया में चले गए थे. मैं इसमें ‘अंधेरे बंद कमरे’ के नायक को भी शामिल कर लेना चाहूंगा. सिर्फ ‘आधे- अधूरे’ के महेंद्रनाथ का लौटना इन सबसे कुछ अलग है. वह ‘घर’ के नरक से भागकर वापस उसी नरक में लौटता है. लौट सकने के विकल्प का प्रारंभिक आभास क्रमशः नायकों के लौटने की विकल्पहीनता में समाप्त होता है. महेंद्रनाथ भीतर और बाहर से इतना विध्वस्त हो चुका है कि लौटने के सिवा उसके पास कोई चारा नहीं है. यह राकेश का अंतिम नाटक है और उस समय लिखा गया था जब वह बाकायदा व्यवस्थित हो चुका था. यानी उसे ‘घर’ मिल चुका था.
राकेश के संदर्भ में घर की तलाश की बात बार-बार की जाती है. निश्चय ही वह तलाश वहां है, वरना यह भटकन, बेचैनी और भागदौड़ क्यों है? जैसा कि मैंने कहा, यह यायावरी नहीं है, किसी खोए हुए सपने की खोज है. आश्चर्य की बात है कि यह घर क्या है, कैसा है, कहां है इसे जांचने की कोशिश कभी नहीं की गई. सिर्फ एक रट है कि घर हो. घर के स्वरूप की जानकारी खुद राकेश को भी नहीं थी. वरना वह इतना भटकता या तोड़ता-जोड़ता ही क्यों? सपनों और जीवन में वह हर बार एक घर बनाता था, बहुत मन से उसे सजाता था, कुछ समय उसमें रहता भी था और फिर उसे छोड़कर भाग खड़ा होता था. उसने अपने मित्रा गिरिधारी को लिखा था कि ‘अगर मैंने घर बनाया तो उसे भी तोड़ डालूंगा’ घर बनाने की ललक और घर का डरµएक साथ ही राकेश को मथते हैं. अज्ञेयजी तो अंत में ऊंचे पेड़ पर मचान की तरह एक स्वायत्त घर बनाने की योजना पर काम कर रहे थे. वह घर उसी तरह सबसे ऊपर और अलग था जैसे काफ़्का की कहानी ‘मांद’ का एक पात्रा चुपचाप जमीन के नीचे अपना घर बनाकर रहने लगता है.
घर को लेकर राकेश उतना ही अनरियलिस्टिक (हवाई) रहा. जब-जब उसने सचमुच घर बनाए, तब वह उनमें नहीं रहा. शायद वे उसके सपनों के घर नहीं थे. वे बार-बार उन दूसरों से टकराते थे जिनके साथ उसे घर बनाने थे. दूसरे हों, मगर वह उसकी अपनी शर्तों पर हों- उसकी इच्छानुसार उपस्थित-अनुपस्थित रहें. मेरी जानकारी में यह शर्त सिर्फ उसकी सौम्य और शब्द-संकोची मां ने ही पूरी की. वे उसकी ऐसी ‘सुविधा’ या आश्वस्ति थीं जो बेटे की खुशी में ही जीवन की सार्थकता मानती थीं. उनका अपना कोई व्यक्तित्व नहीं था. ‘आद्रा’ ऐसी ही मां की अद्भुत कहानी है जो भटकते, असुरक्षित और किन्हीं ‘बड़े सपनों के पीछे पागल’ बेटे को अपने वात्सल्य से सींचती रहती है. मगर मां से भी ज्यादा प्रभावित राकेश अपनी दादी से था- इसे उसने कई जगह स्वीकार किया है. दादी ने बचपन में ही कूट-कूटकर राकेश के दिमाग में भर दिया था कि दूसरे बड़े चालाक, नीच और कमीने हैं. ज्यादातर औरतें चुड़ैलें होती हैं- बच्चों को जहर दे देती हैं, खा जाती हैं. दूसरों पर अविश्वास या उनकी नीयत में शक दादी ने उसे घुट्टी में ही पिला दिया था. इन दुष्टात्माओं से बचाव के लिए ‘घर’ ही सबसे सुरक्षित जगह है. मूलतः उसकी तलाश भूत-प्रेत, राक्षसों-चुड़ैलों से बचाकर रखे गए, सुविधासंपन्न ऐसे ही घर की रोमानी तलाश है. इस तलाश में भटकते, घायल, टूटे हुए शहीद नायक को करुणा, समझ और सहानुभूति देने की प्रक्रिया में उसने आद्र्रा के अलावा, ‘एक और जिंदगी’, ‘अपरिचित’ जैसी उत्कृष्ट कहानियां लिखी हैं, जहां निष्पाप और निःस्वार्थ सहानुभूति देने वाली मां है, बच्चा है या निहायत अपरिचित सहयात्राी हैं- घोड़े और कुत्ते हैं.
अवचेतन में दादी और मां द्वारा दिए गए इस घर के संदर्भ में ही राकेश के दूसरों के साथ संबंधों को समझा जा सकता है. इसी तार्किक परिणति से वह सत्ता के संरक्षण और बसे हुए घर की सुरक्षा में पहुंचता है. पहुंचते अज्ञेय भी वहीं हैं लेकिन उनकी यात्रा की प्रकृति ज्यादा जटिल है.
अज्ञेय ने जीवन एक क्रांतिकारी के रूप में शुरू किया- चंद्रशेखर, भगतसिंह इत्यादि के साथ. लोगों की निगाहों से दूर जंगलों और खंडहरों में बैठकर विदेशी गुलामी से मुक्ति की यह लड़ाई, आज के गुरिल्ला अभियानों जैसी थी. सामाजिक संघर्ष वहां सीधे नहीं था बल्कि वे लोग समाज के हीरो थे. यशपाल भी इसी पार्टी में थे. आगे चलकर यशपाल राजनीतिक, नैतिक, सामाजिक गुलामी के विरुद्ध संघर्ष को व्यापक संदर्भों में समझने, उससे लड़ने की दिशा में सक्रिय होते जाते हैं. वे साम्राज्यवाद और सामंतवाद के खिलाफ कहानियां, उपन्यास, लेख लिखते हैं, उधर अज्ञेय, गुलामी और स्वतंत्राता के तात्विक विवेचन की ओर अग्रसर हैं. ‘शेखर’ इसी बहस की उपज हैं. उनकी चिंताएं निजी होते हुए भी अस्तित्ववादी विमर्श का सहारा लेती हैं. यही कारण है कि ‘नदी के द्वीप’ वाली ‘दीप अकेला’ की अवधारणा ‘अपने- अपने अजनबी’ की ठेठ अस्तित्ववादी काल्पनिक स्थितियों तक पहुंचती है. यशपाल और अज्ञेय दोनों के लिए छोटी जेलें, ‘बड़ी जेलों’ के साक्षात्कार के प्रस्थान-बिंदु हैं, ठीक उसी तरह जैसे बचपन में बाप का आतंक, काफ़्का को अथाॅरिटी के बृहत्तर और व्यापक भयावह चेहरों के सामने ले जाता हैµवह राज्य, नौकरशाही और ईश्वर की सत्ता को समझने, अस्वीकार करने की वैचारिक लड़ाई में उपन्यास- कहानियां लिखता है.
इस दृष्टि से राकेश के यहां घर की तलाश बहुत इकहरी और लगभग सतही है. घर का मूल अर्थ है सुरक्षा-संरक्षण. हम ईंट-पत्थरों या दूसरी सुख-सुविधाओं के साथ-साथ विश्वासों, आस्थाओं, मूल्यों, मान्यताओं के ‘घरों’ में भी रहते हैं या उनकी खोज में होते हैं. राकेश की खोज सिर्फ इस भौतिक घर तक जाती है, मूल्यों और संस्कारों के विवेचन-विश्लेषण की बेचैनी वहां अनुस्थित है. सत्ता हो या परिवार- उनकी संश्लिष्ट बनावट वाले कारकों और तत्वों को उसने शायद ही कभी जांचा हो. उनसे भय और ललक का रिश्ता जरूर बना रहा. यानी वह बेहद चैकन्ने भाव से उनसे अपने समीकरण तय करता रहा. उसकी अधिकांश रचनाएं इन्हीं समीकरणों के बनने-टूटने की तकलीफ से पैदा होती है. वहां सत्ता और व्यवस्था को बनाए रखने वाले मूल्यों की न कोई जांच है, न उनके खिलाफ विद्रोह. यथास्थिति में ही अपने लिए सम्मानजनक जगह पाने की बेचैनी जरूर अनेक तरह दिखाई देती है. बेचैनी यथास्थिति को तोड़ने की नहीं, अपने ढंग से उसे इस्तेमाल करने की है. ऑस्बार्न के ‘लुक बैक इन एंगर’ की तरह वह व्यवस्था को गालियां देने को ही विद्रोह समझता है, जबकि वस्तुतः वह मनचाहा ‘घर’ न मिल पाने का रूमानी गुस्सा है जिसकी परिणति बाद में दूधनाथ और ज्ञानरंजन में है.
आम भारतीय मध्यवर्गीय की तरह राकेश का सपना एक फ्यूडल (सामंती) घर हैµजहां वही ‘कर्ता’ है, शेष उसकी सेवा में ही कृतार्थ होते हैं. वहां जीवन की सारी सुख-सुविधाएं तो हैं, मगर दूसरों के व्यक्तित्व नहीं हैं. सेवा, समर्पण और वफादारी सामंतवाद की मूलभूत मांगें हैं- इनका पालन न करने वाला ‘बागी’ और दुश्मन है. जो ये सब नहीं दे पाए वे बहुत दिनों तक राकेश के अंतरंग नहीं रहे.
अपनी पुस्तक ‘सेण्ट ज़ेने’ में सात्र्रा ने एक महत्वपूर्ण बात कही है: ध्यान से अध्ययन करो: आदमी किनसे सबसे अधिक घृणा करता हैµवे ही उसकी दबी हुई आकांक्षाएं हैं मेरी जानकारी में राकेश तीन व्यक्तियों को सबसे अधिक नापसंद करता था: अज्ञेय, अश्क और धर्मवीर भारती. अज्ञेय के व्यक्तित्व का सायास अर्जित प्रभामंडल, उनकी अभिजात स्नाॅबरी, मनचाही चीजों को कुछ इस तरह साधना कि वे खुद चलकर चरणों में आ गिरें और फिर उन्हें स्वीकार करने का कृपाभाव. सब मिलाकर अस्वीकार की अदाएं. अश्क के पंजाबी दंद-फंद, सारी मान-मर्यादाएं तोड़कर आगे बढ़ जाने, बीच में बने रहने की संकोचहीनता, किसी भी हद तक जाकर काम निकालने का आत्मविश्वास. भारती की सफलताएं- यानी लोगों और स्थितियों को कुछ इस तरह मैनेज करना कि वे अपनी लक्ष्य-प्राप्ति के लिए सीढ़ी बनते चले जाएं. राकेश इन तीनों के ‘गुणों’ को अपने ढंग से सिद्ध करना चाहता था. मुझे हमेशा लगता है कि राकेश की सबसे बड़ी गांठ अज्ञेय ही थे और शायद इसीलिए वे उसके सबसे बड़े ‘माॅडल’ भी थे. (क्या यह भी संयोग ही है कि अज्ञेय, अश्क, भारती और राकेश चारों ने अपनी पहली पत्नियों को छोड़ाµ यानी जिंदगी के अपने पहले चुनावों को अस्वीकार किया?)
अपनी किसी भी तरह की आलोचना राकेश को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं थी- खासतौर पर लेखन को लेकर उसके यहां असहमति की जगह नहीं थी. आलोचना सुनकर किस तरह उसका चेहरा लाल हो जाता था, हम सबने अनेक बार देखा है. मेरे उसके संबंधों की यह सलवट मित्राता टूटने में समाप्त हुई. राकेश से पहले मेरा परिचय सुशीला जी से हो चुका था. वे आगरा के एक काॅलेज (दयाल बाग) में पढ़ाती थीं. मेरी चचेरी बहन वहीं पढ़ती थी और छुट्टियों में राजामंडी आती थी. शीलाजी की जीवंतता, सौंदर्य और पढ़ाने की विकट भक्त थी. कभी-कभी शीलाजी भी साथ आतीं और अक्सर अपने ‘लेखक-पति’ के बारे में बतातीं. शायद नवनीत हो चुका था. राकेश की मां साथ ही रहती थी. कुछ दिनों बाद राकेश से मुलाकात हुई. फक्कड़, ठहाके लगाने वाला खूबसूरत नवयुवक लेखन की योजनाओं से भरा. फिर दक्षिण भारत की यात्रा से पहले कुछ दिनों के लिए आगरा आया था और मैं चूंकि डाॅ. रामविलास शर्मा और अमृतलाल नागर के साथ डेढ़ महीने दक्षिण भारत घूम आया था इसलिए दुनियाभर की सलाहें देने की स्थिति में था. एक दिन मिलने गया तो अचानक ही सुना कि राकेश जी वापस जालंधर चले गए. कल शाम तक तो ऐसी कोई बात नहीं थी. शीला जी रोते हुए उसके झटकेदार व्यवहारों की शिकायत कर रही थीं और मेरी सहानुभूति उनके साथ थी. पत्नी बच्चे को छोड़कर आप भगवान बुद्ध बनने चले जाएंµवह युग आज नहीं है- जैसा ही कुछ कहकर मैंने उसकी भत्र्सना की थी. राकेश को लिखा भी था. तभी से शायद यह गांठ हमारे संबंधों के बीच आ गई कि मैं हमेशा उसे ही गलती पर पाता हूं. उसने नाराज होकर मुझे लिखा भी कि जब मैं पति-पत्नी के बीच रिश्तों की नजाकत नहीं समझता तो कुछ बोलना नहीं चाहिए. बात सही थी. तब तक न मेरी शादी हुई थी, न मैं आपसी रिश्तों की जटिलताओं से परिचित था. बाद में राकेश को बराबर शिकायत रही कि मैं शुरू से ही उसका समर्थक नहीं रहा हूं. पंद्रह सालों की हमारी दोस्ती विश्वासों-अविश्वासों की लंबी दास्तान है. टूटने में मुख्य भूमिका ‘अक्षर’ की है.
अक्षर प्रसंग विस्तार से शायद कभी आए. चूंकि इसके प्रायः सारे पात्रा अभी भी हैं, इसलिए जरूरी है कि इसे- अभी चाहे संक्षेप में ही- बताया जाए. हालांकि, इसकी रूपरेखा कमलेश्वर को जवाब देते हुए ‘संडे मेल’ में और ओमप्रकाशजी पर लिखे संस्मरण में है. मैं कलकत्ता से, राकेश जालंधर से और कमलेश्वर इलाहाबाद से आकर दिल्ली रहने लगे थे और तीनों प्रकाशकीय दुनिया से असंतुष्ट थे. जवाहर चैधरी ज्ञानपीठ में कुंठित हो रहा था और स्वतंत्रा रूप से कुछ कर दिखाने के जोश में था. कई बैठकों में ‘अक्षर’ की योजना बनी- चैधरी व्यवसाय और व्यवस्था देखे और हम सब लेखकीय सहयोग दें. सारा पैसा मैंने और मन्नू ने अपने पास या अपने परिचितों, संबंधियों से लिया. थोड़ा चैधरी का भी था. राकेश-कमलेश्वर शुद्ध सलाहकार थे. इसी आधार पर हम तीनों ही राॅयल्टियों पर रहने के सपने देख रहे थे. नौकरी सिर्फ मन्नू की थी और उसने बाद में प्राॅविडेंट-फंड तक से रुपए निकालकर दिए. चूंकि राकेश कमलेश्वर का कोई आर्थिक उलझाव नहीं था, इसलिए दोनों ने चैधरी को भावनात्मक स्तर पर घेर लिया था. संयोग से उन्हीं दिनों राजकमल से ओमप्रकाश को हटना पड़ा और वहां आ गई शीला संधू. नामवर हुए सलाहकार, पहले ही निर्मल-परस्ती के कारण हम तीनों के शत्राु! हालांकि ‘नई कहानियां’ और राजकमल सोवियत- समर्थक ‘पेट्रियेट’ के साथ हो चुके थे, मगर अभियान चला कि शीलाजी के माध्यम से राजकमल में रूसी पैसा आ रहा है. उस समय ओमप्रकाशजी शहीद थे. चैधरी को अनेक तरह यह बात बताई जाने लगी कि एक पैसे वाली औरत ने ओमजी की जिंदगी-भर मेहनत से बनाई संस्था को हड़प लिया और उन्हें निकाल बाहर किया. उन्हें ‘राधाकृष्ण’ बनाना पड़ा, यानी चैधरी के खून-पसीने से बनाए गए ‘अक्षर’ में भी यह घटना हो सकती है. दूरियां बढ़ने लगीं और स्पष्ट विभाजन यह हुआ कि राकेश, कमलेश्वर, चैधरी एक साथ थे. वे शायद मेरी जिंदगी के सबसे ज्यादा परेशानी के दिन थे. राकेश-कमलेश्वर अपने-अपने ढंग से रह ही रहे थे. मेरी तो सारी पुस्तकें और राॅयल्टी अक्षर में ही फंसी थी और मैं अब वहीं सबसे अवांछनीय व्यक्ति था. वहां से कुछ भी मिलने की स्थिति नहीं थी- कुछ रही भी हो तो चैधरी के हिसाब से उसके पहले अधिकारी वे सलाहकार थे. राजेन्द्र और मन्नू नाम के दो पूंजीपति थे जिन्हें अक्षर से जितनी दूर रखा जाए उतना अच्छा है. किताबें, संपर्क और अन्य साधन देने के बाद उनके वहां होने की प्रासंगिकता भी क्या थी! इसका अर्थ होता था शीला जी की तरह ओमप्रकाश को निकाल देना. उन दिनों राकेश ने अपना कहानी संग्रह ‘फौलाद का आकाश’ इस विशेष पत्रा के साथ चैधरी को दिया था कि यह अक्षर को (यानी राजेन्द्र को) नहीं, दोस्त चैधरी को दिया जा रहा है. इस आपसी तनाव को सुलझाने के लिए विष्णु प्रभाकर और नेमिचंद्र जैन को विश्वास में लेकर दर्जनों अंतरंग मीटिंगें हुईं- क्योंकि मेरे और चैधरी के लिए दोनों तटस्थ और आदरणीय थे. आज भी वे इस प्रसंग के सबसे अधिक जानकार हैं. उधर राकेश ने ओमप्रकाश जी और शीला संधू दोनों को साध लिया था. रूसी पैसे का मुद्दा सहसा गायब हो गया. अलग होने के बाद चैधरी ने जब ‘शब्दकार’ बनाया तो अपने दोस्त चैधरी को राकेश ने कोई किताब नहीं दी. वह हम सबसे ज्यादा व्यवहार कुशल व्यक्ति था. सुलझा हुआ और साफ. कहां कितने भावनात्मक छौंक की जरूरत है उससे ज्यादा यह बात शायद ही कोई जानता हो.
यही वह पृष्ठभूमि थी जो मेरे और राकेश के बीच तनाव बढ़ाती चली गई- परिणति हुई ‘मेरी श्रेष्ठ कहानियां’ की भूमिका को लेकर संवाद समाप्त होने में. राकेश को लगा कि वहां उसकी अपेक्षित महानता को कम करके देखा गया है. वह उसे बदलवाना चाहता था. उससे पहले ‘एक दुनिया समानान्तर’ और मन्नू द्वारा संपादित ‘नई कहानियां’ के विशेषांक के कवर पर सबसे ऊपर नाम दिए जाने के नाटक हो चुके थे. और भी पहले कुछ उर्दू लेखकों के नाम कवर पर देने को लेकर उसने इतना हंगामा किया कि ओमप्रकाश जी को कवर दुबारा छपाना पड़ा. मन्नू से संबंध राकेश के अंत तक बने रहे. कमलेश्वर तो लगभग उसका ‘एरैंड बाॅय’ (स्वयंसेवकों) यानी सबसे ‘अच्छा मित्रा’ रहा. ‘नई कहानियां’ के सौजन्य संपादक के हर आदेश को कुढ़-कुढ़कर स्वीकार करता, उसका सामान या अनिता को यहां से वहां पहुंचाता, ठहरे हुए चाकू के आतंक को झेलता. तनाव के उन्हीं दिनों में राकेश ने मुझ पर बहुत प्यारा ‘मेरा हमदम’ लिखा. इस सारी खींचतान के बावजूद हम तीनों ही कहीं बहुत इमोशनल भी थे. इस मामले में मेरे लिए कलकत्ता में मनमोहन ठाकौर परिवार और राकेश को दिल्ली में चमन- रेखा रेवड़ी, बंबई में राज-उज्ज्वला वेदी के परिवार ऐसे लंगर थे, जहां सारे तूफानों के बाद हमें शरण मिलती थी. मेरी जानकारी में कमलेश्वर को अपने संघर्ष के दिनों में ऐसा कोई परिवार नहीं मिला- यों दोस्त और आत्मीय तो थे ही. अगर महत्वा- कांक्षाएं और प्रतिस्पद्र्धाएं बीच में न आएं तो सचमुच राकेश बहुत खूबसूरत दोस्त
था. दूसरों की बातों, जटिलताओं और समस्याओं की साफ समझ, उन्हें हल करने की सबसे अच्छी राकेश जैसी सलाह
शायद ही किसी के पास हो. बेहद जीवंत और आत्मीय कंपनी. मगर ठीक उन्हीं समस्याओं में खुद इतनी गुत्थियां पैदा कर लेता था कि भागते ही बनता थाµजैसे बच्चा घड़ी के सारे पुर्जे खोल डाले और फिर वापस न लगा पाने की झुंझलाहट में भाग खड़ा हो.
मन तो है कि कभी राकेश पर विस्तार से लिखूं- टुकड़े-टकड़े में जो लिखा है, उसे तरतीब दूं. पहले सोचता था कि उसे लेकर मेरे ये ऑब्जर्वेशन (निरीक्षण-नतीजे) शायद मेरी ही कुंठा हों, मगर इधर उसकी डायरियां, पत्रा इत्यादि पढ़ते हुए मुझे अपने आपको संशोधित करने की जरूरत नहीं लगतीµवहां वह निरंतर अकेला ही होता गया है. कमलेश्वर और अनिता उसे लगातार श्रद्धेय बनाकर जिस तरह सपाटीकृत कर रहे हैं वह उस जीवंत, जटिल और संश्लिष्ट व्यक्तित्व के प्रति नैतिक अपराध है. संपादक की सारी सावधानी के बावजूद उसकी डायरी में बंबई में लिखी (कमलेश्वर के लिए) कुछ पंक्तियां ध्यान देने लायक हैं-...इस बार की कुल प्रतिक्रिया है वितृष्णा. एक-एक बात को लेकर उसकी बढ़ती तोंद और चकले चेहरे की बेहूदा हंसी, झूठे संवेदों की गहरी कोटिंग के पीछे से झांकता फरेब और ओछापन. एक तरफ क-(अर्थात् भारती) का सैटेलाइट, दूसरी तरफ उस पर छुरी चलाने में लगा हुआ. उसके माथे पर लिखा लगता है: मेरे लिए किसी चीज की कोई कीमत नहीं है, सिवा अपने स्वार्थ के... मेरे जैसे दूर से देखने वाले के लिए बंबई प्रसंग इसलिए भी मनोरंजक हैं कि वह भारती की बिसात थी और वहां उसने दोनों को पटखनी दी थी. भारती चाहें तो उन दिनों को लिख सकते हैं-कमलेश्वर तो अपनी दिगंत- व्यापी सफलताओं की फेहरिस्त ही देगा.
लेखक की डायरियां और पत्रा हों (सब मिलकर सात-आठ सौ पन्ने) और उनमें कहीं न समकालीन लेखन की समस्या हो, न किसी देशी-विदेशी किताब का जिक्र आए- यह बहुतों को आश्चर्य का विषय लग सकता है. मगर राकेश के संदर्भ में मुझे कोई ताज्जुब नहीं होता. शायद अपने आप और अपनी महत्वाकांक्षाओं से उसे इधर-उधर देखने की न फुरसत थी, न भीतर झांकने की. जहां यह है कि वहां विश्लेषण नहीं, आत्मधिक्कार है. जैसा कि मैंने कहा, उसके सारे लेखन में न कहीं विद्रोह है, न विरोधµन कहीं नैतिक आक्रोश है, न मूल्यों को परखने-मुठभेड़
करने की तड़प. सब मिलाकर बेचैन कर देने या झकझोरने वाला ऐसा कुछ नहीं है जो अश्लील, आपत्तिजनक, द्रोहात्मक हो. हां, व्यवस्था की जकड़न में घुटते हुए आदमी की झुंझलाहट की बेहद संवेदना और अंतर्दृष्टि से उतारी गई तस्वीरें जरूर हैं- कलात्मक और संतुलित. उसकी कहानियां मुझे हमेशा समरसेट माॅम की याद दिलाती हैं. अर्नेस्ट हैमिंग्वे की बेचैन आत्मा वहां नहीं है. राकेश की मुख्य समस्या है स्त्राी के संदर्भ में अनसमझे आदमी की व्यथा. बदली
हुई स्त्राी से टकराहट फिर शहीदी मुद्रा में पलायन और व्यक्तित्वविहीन समर्पित स्त्राी की शरण.
बहरहाल, राकेश की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि ‘आषाढ़ का एक दिन’ के बहाने उसने स्वतंत्राता के तत्काल बाद की मध्यवर्गीय पीढ़ी की यातनाओं, असफलताओं, रूमानी विद्रोहों और फिर व्यवस्था का हिस्सा बन जाने वाले रचनाकारों का ईमानदार रूपक लिखा है. हम सबके साथ यही दुर्घटना तो घटी है जो कालिदास के साथ घटी- सभी तो अपनी जमीनें छोड़कर ग्लैमर और सफलताओं की ऐसी दुनिया में चले गए जहां हर छोटे-बड़े सम्राट का दरबारी बन जाना ही एकमात्रा विकल्प था- वास्तविक लेखन को स्थगित करते रहे और मन को समझाते रहे कि नहीं, हम अभी भी वहीं हैं, वहीं के हैं और जिस दिन चाहेंगे इस सबको लात मारकर ‘वापस’ चले जाएंगे. शायद भीतर से जानते भी हैं कि वहां ऐसा कुछ नहीं बचा है जहां लौटकर जा सकें. किसने कहा था कि
आज का नायक हैमलेट और डाॅन क्विकज़ोट की संकर नियति लेकर पैदा हुआ है, लेकिन उसे भी हमने ईमानदारी से कहां पकड़ा?
(‘मेरी तेरी उसकी बात’: हंस, दिसंबर 1995)
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